कम्‍युनिस्‍ट इंकलाब‍ का भूत दुनियाँ को आंतकित करने लौट आया है। पिछले पचास से अधिक वर्ष से शासक वर्ग विश्‍वास करता रहा है कि पिछली सदी में और इस सदी के आरंभ में मज़दूर  वर्ग को आन्‍दोलित करते पिशाच सदा-सर्वदा के लिए भगा दिये गये हैं...

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इंटरनेशनल कम्युनिस्ट करण्ट निम्न राजनीतिक पोजीशनें डिफेंड करता है:...

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सेन्ट पॉल के अधिग्रहण[1] स्थित टैन्ट सिटी यूनिवर्सिटी की दीवारों पर लिखे ''पूंजीवाद का जनवादीकरण करो'' के नारे ने ऐसी तीखी बहस छेडी कि अंततोगत्वा बैनरों को ही वहां से हटाना पडा।

यह परिणाम दिखाता है कि सेन्ट पॉल, यूबीएस तथा अन्यत्र अधिग्रहणों ने उन तमाम लोगों को, जो वर्तमान व्यवस्था से असन्तुस्ट हैं और एक विकल्प की खोज में हैं, चर्चा के लिये एक लाभदायिक स्थान मुहैया कराया है......

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पिछले कुछ महीनों से विश्व अर्थव्यव्स्था तबाही में से गुज़र रही है जिसे छिपाना  शासक वर्ग के लिए कठिनतर होता गया है। जी20 से लेकर जर्मनी और फ्रांस की अन्तहीन मीटिंगों समेत,  ‘दुनिया को बचाने’ के लिए की गईं विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शिखर वार्ताओं ने साबित कर दिया है कि पूँजीपति वर्ग अपनी व्यवस्था को पुनरुज्जीवित करने में असमर्थ है। पूँजीवाद एक अन्धीगली में फंस गया है। और किसी समाधान अथवा संभावना का यह नितान्त अभाव विभिन्न राष्ट्रों में तनाव भड़काने लगा है।.....

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एक सहमति, फिर भी विरोध; [1] मौसम वार्ताओं में इज्ज़त बचाने के लिए आखिरी घड़ी में अफरातफरी; [2] ओबामा का मौसम संबन्धी समझौता टेस्ट में फेल [3].. मीडिया का फैसला एकमत था : ‘ऐतिहासिक’ शिखर वार्ता असफलता में खत्म हुई थी।.....

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राजपुरा, पंजाब में मज़दूर

28 फरवरी 2012 को देश के विभिन्न हिस्सों में फैले दस करोड मज़दूरों की नुमाइंदगी करती यूनियनों द्वारा बुलाई हड़ताल हुई। सभी पार्टियों, यहां तक कि हिन्दूवादी बीजेपी, की यूनियनें भी हड़ताल में शामिल हुईं। इसके साथ ही हज़ारों स्थानीय तथा क्षेत्रीय यूनियनें भी। बैंक कर्मी, पोस्टल तथा राज़्य ट्रांसपोर्ट मज़दूर, टीचर्स, गोदी मज़दूर तथा अन्य क्षेत्रों के मज़दूरों ने हड़ताल में हिस्सा लिया। सभी यूनियनें का इस हड़ताल पर सहमत होना इसके पीछे मज़दूर संघर्षों का एक विकास दिखाता है। .....

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विश्व अर्थव्यवस्था रसातल के कगार पर लगती है। 1929 से भी बदतर एक भारी मंदी का खतरा सदैव बढ़ रहा है। बैंक, व्यापार, नगर पालिकाएँ, क्षेत्र और यहां तक कि राज्य दिवालियेपन के रुबरु हैं। और एक चीज़ जिसकी मीडिया अब बात नहीं करता वह है जिसे वे 'कर्ज संकट' कहते हैं...

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